शादी, बर्बादी और आजादी
शादी वास्तव में एक भूल है ! ये न सवाल है। न मंशा है। न दिमागी शैतानी। बल्कि कल्पना की खींची एक ऐसी लकीर । जिसके अहसास में एक सुखन है, जिसे हासिल करने के इरादे कुलांचे मारते रहते हैं । तमाम शादीशुदा लोगों के बीच इस जुमले को उछाल कर उलझनों की एक ऐसी खेप बरामद की जा सकती है, जिसे सुलझाने के बावजूद खाली हाथ रह जाने की पूरी गारंटी है । अब सवाल उठता है कि इस जुमले की जरूरत महसूस क्यों होती है। इस जुमले का इस्तेमाल किसी भी दौर में करना चाहता है। भले शादी के दो साल गुजरे, पांच साल गुजरे और दस साल, इससे आगे का कोई साल आप जोड़ना चाहें तो जोड़ लें। मेरी तरफ से आपको ये छूट है । सवाल उठता है कि ऐसा क्या हो गया। पारिवारिक रिश्तों को निभाने का बूता नहीं बचा या फिर स्वतंत्रता की राह में आपके सपनों की शहादत होने के जख्म पर ये जुमला मरहम की तरह काम करता है। क्या है वजह अगर इसे लेकर ठीक ठीक जवाब किसी से मांगा जाए, तो शायद ही कोई दे पाए। इसके जवाब में चेहरे आनंद की मुस्कान और आंखों में चमक अलबत्ता ये बताने के लिए काफी होगी कि मानो मुंह मांगी मुराद थमाने की बात सामने वाले से कर दी गई है । इस जुमले की ...